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खुद की तलाश में भटकते एक युवा की कहानी है ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’

नई दिल्ली. जीवन में ऐसे कई पल आते हैं, जब हम यह समझने के हालात में नहीं होते कि हमारा रास्ता किस दिशा में जा रहा है. यह ऐसा दौर होता है जब हमें लगता है… कि हमारे आसपास के सारे लोग हमारी मन:स्थिति को समझने में असफल हो चुके हैं. और इस तरह भीड़ में अकेले होते पलों में आज का इंसान शरण लेता है सोशल मीडिया पर बने आभासी दोस्तों और रिश्तों की.

इन हालातों में खड़ी होती कुछ अजीब सी परिस्थितियां जो हमारे असल जीवन को भी प्रभावित करती हैं. आज का तकरीबन हर इंसान आभासी और असल दुनिया के बीच ऐसी ही ऊहापोह में उलझा है और ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’ का नायक अमरीश बिस्वाल भी एक ऐसी ही परिस्थिति में उलझा व्यक्ति है.

कहा जाए तो गलत नहीं होगा कि ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’ एक ऐसे महानगरीय व्यक्ति की कथा है जिसे अपने जीवन में मुकम्मल प्रेम की तलाश है – लेकिन वह अपने भीतर इस तलाश को महसूस नहीं कर पाता और इस तरह उसके कई लड़कियों से प्रेम संबंध बनते हैं. वह एक ऐसी पूर्ण स्त्री की खोज में है जिसका शायद उसकी कल्पनाओं से बाहर कहीं अस्तित्व ही नहीं.

स्त्री चरित्रों का दुर्लभ संगम 
पहली नजर में देखने पर यह उपन्यास स्त्री विरोधी सा प्रतीत होता है. लेकिन जब आप कहानी में उतरते हैं तो आधुनिक स्त्रियों के कई रूप अनुजा, काजू दे, मंजरी और शिवांगी के किरदारों से मुलाकात होती है. यह सभी स्त्रियां हर मायने में आज की स्त्रियों की आजादी, बेबाकी और उनके इस समाज के बराबरी के दावे को प्रतिबिंबित करने में कामयाब नजर आती हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि यह उपन्यास हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श का एक नया अध्याय साबित हो सकता है.

वहीं कहानी की बात की जाए तो कई स्त्रियों में अपने प्रेम की तलाश करता अमरीश बिस्वाल एक शादीशुदा इंसान है, सरकारी नौकरी करते हुए भी अपने भीतर के लेखक के साथ न्याय की कोशिश में लगा है. इस लेखक को तलाश होती है एक ऐसे दोस्त की जो उसे समझे उसके लेखक को आगे बढ़ने में मानसिक साथ दे. इस सिलसिले में उसकी मुलाकात सोशल मीडिया पर कई महिलाओं से होती है. वहीं अंत में अपनी एक प्रेमिका की आत्माहत्या के बाद अपनी फेसबुक आईडी डिलिट कर देता है और सबसे संपर्क तोड़ कर शून्य में विलीन हो जाता है. लेकिन इस बीच आए मानसिक उद्वेलन के दौर आपको कहानी में बांधे रखने में सफल होते हैं. कथा का शिल्प जहां शुरुआत में किताबी है तो अंत में वह फिल्मी हो जाता है.

अपने समय के फकीर और महान कवि कबीर के दोहे से लिया गया शीर्षक ‘हमन हैं इश्क मस्ताना’ अपने आप में सार्थक साबित होता है, क्योंकि यहां पूरी कहानी में एक इश्क ही है जो इंसान को भटकाता रहता है. अगर भाषा की बात की जाए तो उपन्यासकार ने एक व्यक्ति के अंतरद्वन्द्व और प्रेम को बहुत ही बारीकी से रोचकता और आज के दौर की भाषा और शैली में प्रस्तुत किया है. इसमें वर्तमान महानगरीय युवा की मनःस्थिति झलकती है – वर्चुअल दुनिया और यथार्थ के बीच की आवाजाही समय और समाज की सही तस्वीर बना पाती है.

लेखक परिचय 
विमलेश त्रिपाठी का बक्सर, बिहार के हरनाथपुर में जन्म हुआ उन्होंने कोलकाता वि.वि. से केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की है. साहित्यिक संस्था नीलांबर कोलकाता के वर्तमान अध्यक्ष हैं, अब तक चार कविता संग्रह, एक कहानी संग्रह और दो उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं. भारतीय ज्ञानपीठ का नवलेखन पुरस्कार के साथ कई पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं. इनकी रचनाओं का अंग्रेजी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशन हो चुका है.