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कोलकाता मेट्रो के इस लाइन की डिजाइन तो 98 साल पहले ही बन गई थी

कोलकाता (देब्रती घोष):  कोलकाता शहर के लोग जल्द एक नई मेट्रो की सवारी करने वाले हैं. यह नई लाइन ईस्ट-वेस्ट मेट्रो के नाम से जानी जाएगी. इसे ऐतिहासिक अंदाज में तैयार किया जा रहा है. लेकिन क्या आप यह जानते हैं कि इस मेट्रो लाइन पर जो काम चल रहा है उसकी डिजाइन यानी उसका मानचित्र बहुत साल पहले ब्रिटिश शासनकाल में ही तैयार कर लिया गया था. यह डिजाइन इतने सालों बाद कोलकाता नगरपालिका को अचानक मिला है.

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नगरपालिका ने बताया कि मेट्रो की यह डिजाइन अंग्रेजों ने वर्ष 1921 में ही तैयार की थी. इसे लंदन की ट्यूब प्रणाली के आधार पर इंगलैंड के इंजीनियरों ने तैयार किया गया था. ठीक वही मानचित्र कोलकाता नगरपालिका में मिला है.

वर्ष 1921 में भारत में ब्रिटिश शासन फल फूल रहा था. अंग्रेज कोलकाता को ठीक लंदन जैसा बनाना चाह रहे थे और इसीलिए तब इस मेट्रो लाइन के लिए मानचित्र तैयार किया गया था. उन्होंने मेट्रो रेल से कोलकाता शहर को हावड़ा से जोड़ना चाहा और यह डिजाइन तैयार किया. मेट्रो का यह मानचित्र ब्रिटेन में लंदन और अन्य शहरों में भूमिगत रेल पर काम करने वाले इंजीनियर हर्ले डैर्लिम्पल ने तैयार किया था.

आपको बता दें ईस्ट-वेस्ट मेट्रो की यात्रा सल्किया से शुरू होगी और हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचेगी. आप इस यात्रा की कल्पना अभी से कर सकते हैं! यह योजना 1921 में शुरू हुई. यह लाइन कैनिंग स्ट्रीट, डलहौजी, अमहर्स्ट स्ट्रीट को जोड़ेगी और नारकेलडंडा से बागमारी से गुजरेगी.

कोई भी इसकी कल्पना तक नहीं कर सकता कि आज 98 साल बाद वह मानचित्र इस लाइन के मेट्रो को मूर्त रूप देने में काम आएगा. इस लाइन की दूरी 10.4 किलोमीटर होगी और इसपर नौ स्टेशन होंगे.

अंग्रेज न सिर्फ कोलकाता को लंदन की तरह बनाना चाहते थे, बल्कि हावड़ा को भी खास शहर बनाना चाहते थे. आज वहां नए-नए उद्योग लग रहे हैं. इस लाइन को बनाने का उद्देश्य शहर को औद्योगिक क्षेत्र से जोड़ना है. अंग्रेजों को यह बात तभी समझ में आ गई थी कि हावड़ा और सियालदह के बीच संपर्क आसान बनाना काफी महत्वपूर्ण है.

क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यह मेट्रो लाइन अगर उस समय बनती तो इसकी लागत कितनी होती? आपको जानकर शायद आश्चर्य हो सकता है कि आज की भारतीय मुद्रा की कीमत की तुलना में तब इस मेट्रो की लागत महज 4.5 करोड़ रुपये होती.

इस काम को तब पूरा करने के लिए साढ़े चार साल का समय निर्धारित किया गया था. तब की ब्रिटिश सरकार ने इस मानचित्र को मंजूरी भी दे दी थी, लेकिन ब्रिटिश शासन इसे अंतिम रूप नहीं दे सकी और मानचित्र कहीं काल-कोठरी में चला गया.

आपको शायद यह लग रहा होगा कि अचानक इतने लंबे समय बाद यह सब कुछ सामने कैसे उभर आया? दरअसल इस मानचित्र को कोलकाता नगरपालिका के गजट में रखा गया था और यह मानचित्र फाइल की समीक्षा के दौरान सामने आया.

यह पाया गया कि यह मानचित्र वर्ष 1947 गजट में छपा हुआ था. मेट्रो प्रशासन को न्यायपालिका से यह मानचित्र हासिल हुआ जिसने सबकी आंखें खोल दी हैं. न्यायपालिका के अधिकारियों ने कहा कि अगर यह काम 98 साल पहले हो जाता तो आज हमें काफी सुविधा होती.