छत्‍तीसगढ़ मध्यप्रदेश

यह विधानसभा चुनाव शिवराज के जीवन का सबसे कठिन चुनाव क्यों है

लेकिन शिवराज ने दिखाया कि प्रदेश में स्थापति राजनैतिक प्रभु वर्ग को भले ही उनके ये लक्षण कमजोरी लगते हों, लेकिन असल में उनकी यही छवि उन्हें गुदड़ी का लाल बनाएगी. उनकी आम आदमी वाली सूरत मध्य प्रदेश की जनता को जम गई और वह वहां की सत्ता में जम गए.

कांग्रेस नेता को पार्टी ने नहीं दिया टिकट तो सिंधिया की प्रतिमा के सामने पी लिया जहर

उस लहर से कांग्रेस के दो ही नेता बच सके पहले कमलनाथ और दूसरे ज्योतिरादित्य सिंधिया. अब 2018 में कांग्रेस इन्हीं दो नेताओं को आगे कर चुनाव लड़ रही है. लेकिन शिवराज की असली चुनौती इन नेताओं से नहीं है.

उनकी असली चुनौती यह है कि एक तो प्रदेश में भाजपा सरकार को 15 साल हो गए हैं. इतना समय जनता के बोर होने के लिए काफी है. दूसरे यह 2013 नहीं है जब नरेंद्र मोदी नाम ही हवा चलाने का फॉर्मूला बन गया था. तीसरी बात यह कि किसी को नहीं पता कि अगर भाजपा चौथी बार जीतती है तो शिवराज ही मुख्यमंत्री बनेंगे.

इन बदले हालात से निबटने में जरा सी चूक चौहान के लिए आफत बन सकती है. इस बार भाजपा ने जिस तरह टिकट बांटे हैं, उसमें यह साफ कहा जा सकता है कि टिकट वितरण में शिवराज को उस तरह का खुला हाथ नहीं मिला, जैसा कि पिछले दो विधानसभा चुनाव में उन्हें मिला था. इस बार पार्टी को जिस तरह अपने 5 मंत्रियों सहित 51 विधायकों के टिकट काटने पड़े हैं, उससे साफ समझा जा सकता है कि पार्टी इस चुनाव को लेकर कितनी सतर्क है. एक-एक टिकट फूंक-फूंक कर बांटा गया है.

अगर टिकट वितरण में शिवराज की पूरी तरह नहीं चली तो दूसरे नेताओं की भी नहीं चली. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय अपने बेटे को तो टिकट दिला ले गए, लेकिन अपना टिकट नहीं बचा पाए. लोकसभाध्यक्ष सुमित्रा महाजन अपने बेटे-बहू को टिकट नहीं दिला पाईं. 10 बार के विधायक पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का टिकट कट गया और उनकी बहू कृष्णा गौर को भी तब टिकट मिल सका, जब उन्होंने पार्टी छोड़ने की धमकी दे दी. पूर्व मंत्री सरताज सिंह टिकट न मिलने पर कांग्रेस में चले गए और होशंगाबाद से कांग्रेस प्रत्याशी होंगे.

ये सारे कारक बताते हैं कि 2018 में मध्य प्रदेश भाजपा एक कठिन लड़ाई लड़ने की तैयारी कर रही है. इस लड़ाई को लड़ने के लिए केंद्रीय नेतृत्व चीजें खुद अपने हाथ से कर रहा है और प्रदेश के नेतृत्व की भूमिका सीमित है. आरएसएस की तरफ से शीर्ष नेतृत्व को सौंपा गया फीडबैक इस चुनौती को और कठिन बनाने वाला रहा है.

उधर, मध्य प्रदेश में अपना सियासी वर्चस्व कायम करने के बाद से पहली बार ऐसा हो रहा है कि भाजपा को सवर्ण वोटरों के विरोध का सामना करना पड़ा हो. अभी कोई नहीं कह सकता कि भाजपा के साथ बंध चुका यह वोटर किस हद तक उससे कटेगा. कटेगा भी या नहीं. लेकिन इस वोटर ने भाजपा को डरा बुरी तरह से दिया है.

इन सारी बातों को मिलाकर देखें तो ये सब शिवराज का सिरदर्द बढ़ाने वाली चीजें हैं. अगर भाजपा चुनाव जीतती है तो इसका श्रेय केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति को जाएगा और अगर भाजपा चुनाव हारती है तो सारा ठीकरा चौहान के माथे पर फूटेगा. चौहान को यह सारी बातें बहुत अच्छी तरह से पता हैं. इसलिए उन्होंने पूरे प्रदेश का कई-कई बार दौरा किया है. उन्होंने इस बात की पूरी कोशिश की है कि आम आदमी तक उनकी सरकारी योजनाएं नारे के बजाय काम के शक्ल में पहुंचें. वे पूरी शिद्दत से लोगों को एहसास करा रहे हैं कि राजे-महाराजे एक किसान के बेटे को तख्त से हटाना चाहते हैं. पार्टी के भीतर भी वह संकेत दे चुके हैं कि दिल्ली के दरबार में मत्था टेकने वाले मठाधीशों को हद से ज्यादा तवज्जो दी गई तो जमीन पर हल चलाने वाले किसान भटक जाएंगे. पूरे देश में भाजपा सरकारों द्वारा चलाई जा रही नाम बदलने की लहर और रह-रहकर मंदिर मुद्दे की शरण में जाने के बजाय शिवराज अब भी अपना काम गिना रहे हैं. वे ऐसा कर पा रहे हैं क्योंकि उन्होंने आम आदमी के लिए काम किया है. लेकिन यह बात खुला रहस्य की इस मुल्क में चुनाव काम पर कम और हवा पर ज्यादा होते हैं. हवा का यही रुख शिवराज की चुनौती है.

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