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ऑपरेशन ब्‍लू स्‍टार में लिया था हिस्‍सा, 34 साल बाद SC से मिला खोया सम्‍मान

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सेना के एक पूर्व अधिकारी का सम्मान बहाल किया है जो 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार का नेतृत्व करने वाले अधिकारियों में शामिल थे. न्यायालय ने उन्हें कदाचार के आरोपों से बरी करने और सेवानिवृत्ति के पश्चात लेफ्टिनेंट कर्नल का रैंक दिये जाने के फैसले को बरकरार रखा. शीर्ष अदालत ने मेजर (अब सेवानिवृत्त) कुंवर अंबरेश्वर सिंह को स्वर्ण मंदिर परिसर से सिख अतिवादियों का सफाया करने के लिये चलाए गए अभियान के दौरान बरामद कुछ इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं को अपने पास रखने के आरोपों में सुनाई गई ‘फटकार की सजा’ को निरस्त करने के सशस्त्र बल अधिकरण(एएफटी) के फैसले को बरकरार रखा.

न्यायमूर्ति ए के सीकरी और न्यायमूर्ति अशोक भूषण की पीठ ने एएफटी के आदेश के खिलाफ केंद्र की अपील को खारिज कर दिया, लेकिन लगाए गए जुर्माने को 10 लाख रुपये से घटाकर एक लाख रुपया कर दिया. पीठ ने कहा, ‘‘हम इस अपील में कोई दम नहीं पाते हैं इसलिये इसे खारिज किया जाता है. हालांकि, हम पाते हैं कि अपीलकर्ता पर लगाया गया 10 लाख रुपये का जुर्माना काफी अधिक है. इसलिये हम उसे घटाकर एक लाख रुपया करते हैं.’’

एएफटी का फैसला
एएफटी, लखनऊ ने पिछले साल 11 अगस्त को अपने फैसले में सिंह को सभी आरोपों से बरी कर दिया था और लेफ्टिनेंट कर्नल का रैंक देने से इंकार करने के सेना प्रमुख के आदेश को निरस्त कर दिया था. एएफटी ने कहा था कि सरकार अनुमानित आधार पर सिंह को लेफ्टिनेंट कर्नल (टाइम स्केल) के पद पर पदोन्नत करेगी ताकि वेतन का बकाया और सेवानिवृत्ति के बाद के बकायों यथा पेंशन और अन्य लाभों का भुगतान किया जा सके. अधिकरण ने कहा था, ‘‘जून, 1984 के ऑपरेशन ब्लूस्टार का प्रभाव अब भी सता रहा है और मौजूदा मामला उसी अभियान से जुड़ा है जहां भारतीय सेना का एक कमीशंड अधिकारी न्याय पाने के लिये पिछले 33 वर्षों से संघर्ष कर रहा है.’’

सिंह 1967 में सेना में शामिल हुए थे. वह जून 1984 में 26 मद्रास रेजीमेंट में मेजर के रूप में 38 इनफैंट्री ब्रिगेड और 15 इनफैंट्री डिवीजन के हिस्से के तौर पर जालंधर में पदस्थापित थे. उसी वक्त उन्हें अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर से अतिवादी सिखों का सफाया करने का काम सौंपा गया था.